परिचय
लेखक:
महाकवि कालिदास, जिन्हें संस्कृत साहित्य का सर्वश्रेष्ठ कवि माना जाता है। उनकी भाषा में सहजता, लय, और चरम मनोरम अलंकार विद्यमान है।
नाटक की पृष्ठभूमि:
- मूलतः सात पड़ावों (Acts) एवं एक प्रस्तावना (Prologue) सहित, यह नाटक राजा दुष्यन्त और शकुंतला की अलौकिक प्रेमकथा का रूप है।
- इसमें दृश्य–पाठ, कवित्त, संवाद, और भाववर्णन का अद्भुत संगम मिलता है।
- कथा के केंद्र में “भूतल” (धरती), “दानव” (अभिमन्यु के पुत्र), और “स्वर्ग” (स्वर्गारोहण) जैसे पौराणिक तत्त्वों के साथ-साथ मानवीय भाव-उत्कर्ष भी हैं।
पात्रावलि
- राजा दुष्यन्त — गुप्त विश्वविद्यालय के राजा, शकुंतला के प्रेमी
- श्रुतमित्र — राजा का मित्र व उपदेशक
- शकुंतला — ऋषि विश्वामित्र की संतान, भरतवाणी आश्रम में पली-बढ़ी
- कुमारिका (अनुसूया) — शकुंतला की सहधर्मिणी
- वशिष्ठ — राजर्षि, दुष्यन्त के परिचारक
- अन्य ऋषि-मुनि — विश्वामित्र, काट्याकाका आदि
- नागदासी — इन्द्रपुत्र इन्द्रसेना की पत्नी
- चाणक्य — दरबार में एक विदूषक पात्र (वैकल्पिक)
- परी — वन के दृश्य में प्रकट होती है
- दूत — राजा का संदेशवाहक
प्रस्तावना (Prologue)
वक्त्ररुण (Narrator):
हे दर्शकों!
रज-वर्ण वस्त्र राहु-चिह्न-सी अलंकृत कर लो,
समस्त इन्द्रियाँ संयम के व्रत में बंधाएं,
चित्त-सरिताएँ समाधि-लहरों में लीन हों;
क्योंकि अब एक अत्यंत पावन, दैवी प्रेमकथा
आपके हृदय-तट पर अमृत-सात्विक स्पंदन बिखेरने वाली है।
अंक I. मूक मिलन
दृश्य: भरत-वाणी आश्रम के समीप वन-किनारा, प्रातःकाल
पात्र:
- शकुंतला (ऋषि विश्वामित्र की कन्या, वन में भ्रमण कर रही)
- कुमारिका (शकुंतला की सहधर्मिणी)
- दूत (राजा दुष्यन्त का संदेशवाहक)
[प्रातः-स्निग्ध ध्वनियों के बीच, शकुंतला और कुमारिका वन-कुसुमों के बीच से चलकर आती हैं।]
कुमारिका
(मधुर स्वर में)
शकुंतला, देखो—कोमल कलियों पर ओस के मोती झिलमिला रहे हैं; क्या यह सृष्टि का वंदनीय दृश्य नहीं?
शकुंतला
(नम्र मुस्कान से)
हाँ, मेरी सखी। पर मेरा हृदय आज कुछ उदास है—मानो प्रेम-माधुरी से दूर तीर-कांटे उगा रहे हों।
कुमारिका
(विषय-विनोद में)
क्या दुष्यन्त राज से एक संक्षिप्त मिलन ही तुम्हें इतने विमोहित कर गया?
शकुंतला
(चिन्तनशील)
राजा दुष्यन्त की दृष्टि में मेरा मन-विसर्ग इतना प्रभावशाली था,
कि मेरा मन-चिन्तन उसी की स्वीकृति-शब्द पर लीन हो गया।
पर अभी तक कोई अभिज्ञान-चिन्ह (प्रशस्ति-पट्ट) हाथ में नहीं मिला—
क्या अब तक वह मुझको भूल गया है?
कुमारिका
(उत्साहित स्वर में)
नहीं, हे सखि! शीघ्र ही वह तुम्हें सिंहासन-नगरी में आदर-युक्त स्मृति-अभिज्ञान भेजेगा;
राजाओं का वचन बार-बार अक्षुण्ण रहता है।
[इसी बीच एक दूत आती है, हाथ में एक मोर-कानपत्र धारित, धीमे स्वर में घोषणा करती है।]
दूत
(विनम्रता से)
हे सुंदरी! राजा दुष्यन्त का सन्देश—
“शकुंतला! अवसर शीघ्र पाव,
दरबार-भूमि पर मान-योग्य अभिनंदन को आतुर हूं।”
[शकुंतला क्षणभर मौन—आतुरता में चञ्चल हो उठती है; फिर कुमारिका की ओर झुककर]
शकुंतला
(प्रफुल्लित)
जी प्रिये! आज स्वप्नवत् आनन्द-वर्षा होगी;
मम मन-रथ रीति-तुरन्त अशोक-कदंब की ओर चले।
कुमारिका
(प्रेरणा से)
आओ, शीघ्र! तेरे सौभाग्य-विमुच्य दल को पवित्र मन्त्रों से स्नान कराएं—
तब ही मिलेगा तुझे सिंहासन-नगरी का स्वर्ण-चिह्न।
[दोनों वन-कुसुमों से पुष्प-हार बनाकर स्वयं को अलंकृत कर विमुक्त-हास्य से चल पड़ती हैं; प्राचीरारोही वसंत-वाताशय में पक्षी-गीत गूंजने लगते हैं।]
अंक II. दुर्वासा का श्राप और अंगूठी की हानि
दृश्य: भरत-वाणी आश्रम का प्रांगण, दोपहर
पात्र: शकुंतला, कुमारिका, ऋषि दुर्वासा, दूत
चारों ओर सन्नाटा है। कुएँ के पास बैठी शकुंतला भाव-विक्षिप्त होकर दुष्यन्त के स्मरण में खोई हुई है। कुमारिका करीव आकर धीरे से फुसफुसाती है:
कुमारिका:
“हे शकुंतला! देखा—गोवर्धन पर्वत की छाया भी अब शाम का आभास देने लगी है। विचित्र है कि तुम उस दूत को याद न कर रही हो, जिसका हमें दो बजे के बाद इंतज़ार था।”
शकुंतला (आश्चर्य से तंद्रा से जागकर):
“क्या दूत आ चुका? मुझे तो कोई आगमन-ध्वनि सुनाई न दी। मेरा मन तो पूर्णतः दुष्यन्त में मिल गया था।”
कुमारिका दौड़कर आश्रम के द्वार की ओर देखती है; निवर्तमान चहल-पहल तो दूर, कोई भी आगन्तुक नहीं दिखता।
इसी क्षण एक कातर ब्राह्मण, हाथ में एक पत्र लेकर, शांति से प्रवेश करता है।
दूत:
“हे जिज्ञासु कन्याएँ, राजा दुष्यन्त का संदेश—’अभिनंदन की प्रकिया विलम्बित हुई, अतः सावधानीपूर्वक निवास कर समयानुसार प्रातः ही लोट आना।’”
शकुंतला पत्र पढ़कर हर्षित होती है, पर तभी दूर से एक भयावह स्वर सुनाई देता है—कोई तिरस्कारपूर्ण स्वर, जैसे किसी ने अपमानित सी झिड़की दी हो।
ऋषि दुर्वासा तेज चाल से प्रवेश करते हैं, रूप में क्रोधित, नेत्रों में अग्नि:
दुर्वासा:
“मेरा अभिवादन कौन करता है? कहो, तुम नारी हो या मूषक सम?”
शकुंतला क्षण में संभलकर प्रणाम करती है, पर उसका मन घबराग्रस्त है—वह भुल गई थी कि ऋषि को आदर देना उसकी प्रथम कर्तव्य है।
शकुंतला:
“महाराज, क्षमा चाहती हूँ—पर मेरा मन दुष्यन्त के अभिज्ञान-पत्र में लीन था।”
दुर्वासा का सम्मोहनकारी क्रोध धधक उठा:
दुर्वासा:
“जिसने अपने गुरु का स्मरण खो दिया, दूसरों का अभिज्ञान कैसे रखेगी? मैं तुम्हें श्राप देता हूँ—वह पुरुष, जिसके में तुम्हारा हृदय रमा है, भुला देगा तुम्हें; जब तक अपना स्मारक-चिह्न (अभिज्ञान-पट्ट) प्राप्त न हो!”
वे अभिमंत्रित हाथ उठाकर चले जाते हैं। आश्रम गिरजा-सा खामोश हो जाता है। कुमारिका चीख़ते हुए शकुंतला का हाथ थाम लेती है:
कुमारिका:
“यह श्राप अप्रत्याशित है—ऐसा नहीं होना चाहिए था!”
शकुंतला फूट-फूटकर रोने लगती है, प्रार्थना-स्वर में:
शकुंतला:
“हे दुष्यन्त! यदि मेरा अंगूठी-प्रतीक तुझे वापस मिले, तो स्मरण होगा; अनन्त काल के लिए वियोग सहन होगा—परन्तु यदि पातालजाल में खो गया, तो मेरा भाग्य अभिशप्त है।”
तभी देहली प्रहरियों का एक छोटा दल आता है और एक स्वर्ण-कलश रखे हुए ब्राह्मण से कहता है कि कुछ सुनसान तालाब में मछुआरे से महिलाओं द्वारा बिखेरी अंगूठी मिली है।
ब्राह्मण स्वर्ण-कलश खोलता है—अंदर दुष्यन्त का अभिज्ञान-पट्ट होता है। शकुंतला आंसुओं से भीगी आँखों से अंगूठी थाम लेती है, और श्राप का कोई असर निश्चल हो जाता है।
शकुंतला (हर्षित स्वर में):
“हे महाप्रभु! तुम्हारा अभय और मेरी श्रद्धा विजयी!”
कुमारिका (प्रसन्न होकर):
“अब दुर्वासा का श्राप अधूरा ही रहेगा।”
आश्रम में पुनः शांति फैल जाती है, और शकुंतला इस अप्रत्याशित उद्धार पर द्रवित हृदय से अनुराग भाव व्यक्त करती है।
अंक III. दुष्यन्त का दरबार
दृश्य: राजसभा, अपरान्ह का समय
पात्र:
राजा दुष्यन्त, श्रुतमित्र, पुरोहित, दूत, दूसरे दरबारी
विस्तृत सिंहासन-कक्ष के पिछले कोने में द्रोण-कवच और मीन-आकृति अलंकरण देखे जा सकते हैं। राजा दुष्यन्त गर्वित मुद्रा में सिंहासन पर विराजमान हैं। सामने श्रुतमित्र और पुरोहित ध्यान से बैठक कर रहे हैं।
दूत
(नम्रता से राजदेव की ओर मुख किए)
महाराज, भरतवाणी आश्रम से आगंतुक कन्या ने अपनी कथा प्रस्तुत करने का आग्रह किया है।
राजा दुष्यन्त
(आंखों में उत्सुकता)
शकुंतला का दृश्य तो अवश्य विलक्षण होगा। उसे बुलाओ।
दूत सिर झुकाकर लौट जाता है। कुछ क्षण बाद आश्रम का सुवर्ण-कलश लिए पुनः प्रकट होता है।
दूत
(विनम्र स्वर में)
महाराज, अवलम्बन-चक्रस्थानों की अनुमति हुई—शकुंतला आ रही है।
समान दूत द्वारा दो स्तरीय रक्षकों को आदेश देते हुए प्रवेशद्वार पर तैनात कर दिया जाता है। थोड़ी देर पश्चात् शकुंतला पुष्प-हार और अभिज्ञान-पट्ट लिए धीरे-धीरे प्रवेश करती है।
शकुंतला
(सहजता से कदम रखते हुए)
प्रणाम, देवयोस्त्रयो—राज्य के गौरव को अभिनंदन।
राजा दुष्यन्त के चेहरे पर आदर और स्नेह की छाया नजर आती है।
राजा दुष्यन्त
(मृदु मुस्कान के साथ)
शकुंतला! तुम्हारा अभिवादन पाया। बताओ, श्रुतमित्र के अनुसार तुम्हारा मन वियोग-क्लेश से पीड़ित था—अब क्या सुख-समाचार है?
शकुंतला
(नम्र स्वर में)
भगवन, मेरा मन रक्त-संबंध से नहीं, स्मृति-चिह्न से बँधा था। आपकी अंगूठी प्राप्त होते ही मेरा हृदय मग्न हो गया।
श्रुतमित्र
(सहायक स्वर में)
महाराज, इस नारी का धैर्य और श्रद्धा अद्वितीय है।
पुरोहित
(धीरे से)
इन गुणों के साथ वह केवल प्रियंका नहीं, वरन् समाज-संस्कार की प्रतिमूर्ति भी है।
राजा दुष्यन्त
(गंभीर भाव से)
यदि कल दुर्वासा ने श्राप दे दिया था, तो तुम्हारी रक्षा कैसे हुई?
शकुंतला
(आत्मविश्वास से)
हे राजन्, श्रुतमित्र ने विनय-पद्धति से विरचय-प्रार्थना की, और आपके अभिज्ञान-पट्ट ने श्राप का प्रभाव नष्ट कर दिया।
राजा दुष्यन्त
(दिये गए समाधान से प्रसन्न)
बहुत अच्छी कला-क्षमता! नारी की निष्ठा और मित्रों की बुद्धि ने मिलकर न्याय साधा।
दूसरे दरबारियों को इशारे से दूध-जल की पट्टिका लाने का आदेश देते हुए वे आगे कहते हैं:
राजा दुष्यन्त
(उल्लासित स्वर में)
आज से शकुंतला को राज्य-गौरव के अनुसार स्थान मिलेगा, और अभिज्ञान-पट्ट सदैव तुम्हारी स्मृति-चिन्ह बनी रहेगी।
शकुंतला
(श्रद्धापूर्वक)
धन्यवाद, महाराज। मैं आपके आदर का सदैव पालन करूँगी।
राजा दुष्यन्त
(दूत को संबोधित कर)
दूत, आश्रम को सूचना दो—शकुंतला का सम्मान तथा राज्य की ओर से उपहार प्रेषित किए जाएँ।
दूत
(सर झुकाकर)
भगवन्, तुरंत आदेश पूर्ण कर दिया जाएगा।
सभी दरबारियों का हाथ जोड़कर अभिवादन। धीमे-धीमे सब परदा गिर जाता है।
अंक IV. शाश्वत स्मृति और स्वप्न-दर्शन
दृश्य: भरतवाणी आश्रम का उपवन, संध्या का समय
पात्र: शकुंतला, कुमारिका, पुष्पगुहा का वनदूत, परी
किरण-झिलमिलाहट में आश्रम का उपवन शांत एवं मनोरम दिख रहा है। पुष्पों की महक चारों ओर फैली है।
शकुंतला (एक वृक्ष तले मनन करते हुए)
“मेरे मन में हलचल कैसी है—वियोग का साया तो दूर हुआ, पर अब स्मृति-रूपी दीपक की अस्थिर ज्योति ने मुझे एक अनजानी निद्रा में लीन कर दिया।”
कुमारिका (करीब आकर)
“हे सखी! यदि तुम्हारे हृदय में प्रसन्नता है, तो ये अशोक-पत्तिका तुम्हें शीतल कर दे; क्या तुम दुखी हो?”
शकुंतला
“नहीं, प्रिय! यह नीरवता तो केवल वैराग्य-सी है—काश यह अनुभूति सदा रहे!”
इसी समय एक वनदूत पुष्पगुहा से प्रकट होता है, हाथ में मधु-अर्पण पात्र लिए।
वनदूत
“शकुंतला! दुष्यन्त-राजा का संदेश—‘अशोक वृक्ष तले स्वप्न-दर्शन का समय आया; पधारकर दर्शन करो।’”
शकुंतला (आतुरता से)
“स्वप्न-दर्शन? वह कौन सा स्वप्न होगा, जहाँ सत्य और कल्पना मिलकर हृदय को सजाते हैं?”
कुमारिका
“आओ, वनदूत ने बुलाया है; उस स्वप्न में हमें अनन्त सुख-प्रकाश देखना है।”
दोनों उपवन से अशोक वृक्ष तक वियोग-वात्सल्य की वेदना के साथ बढ़ती हैं।
अशोक वृक्ष के समक्ष एक परी प्रकट होती है, दीपवत् रोशनी लिए, विलोम आंखों में स्वप्निल रीति।
परी
(स्वर लय में)
“हे पात्रा! स्वप्न-शालिनी में पाप-छाया नहीं, केवल आत्म-साक्षात्कार का प्रकाश है। देखो—”
वह एक चमकीली लीलि-राशि संक्षिप्त रूप में प्रदर्शित करती है, जहाँ शकुंतला और दुष्यन्त प्रेमपूर्वक संवाद कर रहे हैं, किंतु दूरस्थ दृश्य में अतीत के क्षण—दुर्वासा का श्राप और पुनर्प्राप्त अभिज्ञान-पट्ट—बीच-बीच में झलकते हैं।
शकुंतला (विस्मय से)
“यह दृश्य मेरा ही है—परलौकिक स्पर्श से भरा!”
परी
“यथार्थ और स्वप्न के मिलन में यही मधुरता, यही कलुषहीनता विद्यमान है; इसे हृदय में बसा लो।”
परी एक अंतर्ज्ञानी मुस्कान के साथ गायब हो जाती है।
कुमारिका
“यह स्वप्न नहीं, वरन् आत्मा की आवाज़ थी। अब तुम्हारा मन शांत होगा।”
शकुंतला (नम्रता से)
“हाँ—मैंने पाया आत्म-ज्योति का प्रतिबिंब। अब जीवन-सागर में कोई तरंग असंतुलित नहीं रहेगी।”
उपासना-सदृश मौन के साथ दोनों सखियाँ आश्रम की ओर लौटती हैं।
अंक V. विरह-वेदना और मातृत्व का आह्वान
दृश्य: भरतवाणी आश्रम का एकांत आँगन, प्रातःकाल
पात्र: शकुंतला, कुमारिका, आश्रमस्थ जीविका (गृहिणी)
चारों ओर शीतल हवा का प्रवाह है, पक्षियों का मधुर कलरव सुनाई देता है। शंखचिह्नित स्नानार्थ टिपटे हुए शकुंतला उदास मुद्रा में आँगन में टहल रही है। कुमारिका उसके समीप आती है।
कुमारिका:
“हे शकुंतला, क्या तुम आज भी मोर-माला के डीपक-प्रभात में उदासी-विह्वल हो? क्या दस लोचन सुंदरी के हृदय में अब तक घटित मिलन की मधुरता नहीं उजागर हुई?”
शकुंतला (धीमे स्वर में):
“मधुर मिलन स्वप्नवत् बीत गया, प्रिय! समीप-सन्निकटन की अनुभूति तो अब स्मृति-रूपिणी बसंती वर्षा-शेष सी शुष्क हो चली।”
कुमारिका का चेहरा करुणा से लबालब हो उठता है; वह पास खड़ी एक वृद्ध गृहिणी को इशारा करती है, जो आश्रम की दैनिक सेवा-सामग्री समेटने आई है।
कुमारिका:
“जीविका, हमें शकुंतला के धन्यवाद-आवन्तन हेतु तुलसी जल भेजो, और नवोदित माँ के लिए पुष्पार्चन की व्यवस्था करो।”
जीविका नम्रता से तुलसी जल लेकर आती है; कुमारिका शीघ्र एक स्वर्ण-कुम्भ में जल भरकर सामने रख देती है।
जीविका:
“यह जल और पुष्प पूर्णतया पवित्र हैं, कन्ये—इन्हें ग्रहण करने से हृदय को संतोष मिलेगा।”
शकुंतला (जल ग्रहण कर):
“तुम्हारा यह स्नेह, जीविका, और तुम्हारा यह पाठ, कुमारिका, मेरे व्यथित मन को शांत कर देते हैं।”
कुमारिका प्रभावित होकर शकल-कलश में से एक कलम निकालती है, जहाँ एक सोनित-कांस्यण अंडाकार पुटलिका दिखलाई देती है।
कुमारिका:
“यह तुम्हारे लिए—तुम्हारा पालन-पोषण करते समय मैंने यह अंडाकार चिह्न देखा था। मुझे आशा है कि यह स्मृति-चिन्ह तुम्हें पुनः दुष्यन्त के निकट ले जाएगा।”
शकुंतला (चिंतन करते हुए):
“यह चिह्न ही तो वह अभिज्ञान-पट्ट था, कुमारिका। अभिशप्त श्राप के बाद भी यह मेरी आशा की किरण बनकर जगमगा रहा है।”
वह चुपचाप टूटे पत्तों पर बैठ जाती है; कुमारिका उसका हाथ थामकर कहती है:
कुमारिका:
“हे सखी! उस राज्य-शाला में रहकर दुर्लभ सुख का अनुभव कर लेने से बेहतर है कि तुम यहाँ आश्रम में विश्राम करो। जीवन-कल्प में मातृत्व की प्रथम झलकियाँ तुम्हें धैर्य प्रदान करेंगी।”
शकुंतला:
“हाँ, मुझे अपने अज्ञान और विरह के समुंदर में इस आश्रम की छाया ही उपशम देगी। पर मेरी आँतरिक चिंता घराने का भवितव्य—क्या हुआ उस शुभ बिंदु का, जिसे दुष्यन्त ने अंकित किया था?”
कुमारिका:
“तुम्हारा गर्भ शोधित हो रहा है—एक दिन तुम्हारा पुत्र दीप-ज्योति की तरह प्रस्फुटित होगा, और पिता-पुत्र का मिलन अवश्य ही सुखद होगा।”
शकुंतला की श्रद्धा और मातृत्व-वेदना मुखरित होती है; वह कुमारिका के कंधे पर सिर रखकर मृदु स्वर में कहती है:
शकुंतला:
“यदि मेरा धैर्य इतना सशक्त हो, कि पितृत्व-वियोग सहन कर पाऊँ, तो मातृत्व की सौम्यता तो असीमित होगी।”
उनके संवाद के बीच, आँगन के कोने में खिलखिलाती तितलियाँ मंडराती हैं—जीवन के पुनरुत्थान का संकेत। कुमारिका और शकुंतला को एकांत आनंद-प्रवृत्ति सा अनुभव होता है।
अंक VI. दुष्यन्त का वन-दर्शन
दृश्य: कृपाश्रम के निकट वन-मार्ग, प्रातःकाल
पात्र:
- राजा दुष्यन्त (शिकार-सवारी कर रहे)
- श्रुतमित्र (सहायक रूप में राजसखा)
- शकुंतला
- कुमारिका
हल्की धूप में चीड़ के वृक्षों की छाया पड़ी है। राजा दुष्यन्त मृग-दानवों का शृंखलाबद्ध क्रम देखते हुए वीरतापूर्वक तलवार थामे आगे बढ़ रहे हैं। श्रुतमित्र उनके समीप रहता है।
राजा दुष्यन्त:
“श्रुतमित्र! यह वन-path विशेष सुशोभित है—हृदय को विश्राम देने वाला। किंतु मुझसे कोई कलंक-आभास क्यों नष्ट नहीं होता?”
श्रुतमित्र:
“महाराज, आपकी चित्ता अभी भी शकुंतला के विरह-वेदना से मर्माहत है। यहाँ आने का प्रयोजन ही आपको शांत करना था।”
इसी समय, एक कोमल स्वर सुनाई देता है—कहीं दूर से गंधर्व-मृदंग की धुन सी। द्यूति-अल्प प्रकृतिमध्य से शकुंतला और कुमारिका पुष्पहार लिए दृष्टिगत होती हैं।
शकुंतला (विस्मयित)
“कुमारिका! क्या यह स्वप्न है कि हम यहाँ आए हैं—जहाँ मेरे प्रेयसी का रूप विभोर कर देता है?”
कुमारिका
“धीरज रखो, सखी—अब देखो, वह दुष्यन्त! चाहे बिना अभिज्ञान-पट्ट के मिले, तुम्हारी आत्मा उसे पहचान लेगी।”
राजा दुष्यन्त अजगर-सदृश् तटस्थ होकर तलवार हाथ में थामे खड़े देखते ही रह जाते हैं।
राजा दुष्यन्त
(धैर्य से)
“श्रुतमित्र! यह स्त्री शकुंतला है—मुझे दृढ विश्वास है।”
श्रुतमित्र सिर हिलाकर संकेत करता है। दुष्यन्त धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हैं। शकुंतला का मन धड़क उठता है; कुमारिका पीछे हटती है।
शकुंतला
(कांत पुकार से)
“दुष्यन्त!”
राजा दुष्यन्त रुककर हँसी से प्रतीति करते हैं।
राजा दुष्यन्त
(विषण्णता मिटाते हुए)
“शकुंतला! क्या यह ज्यों का त्यों स्वरूप तेरा ही है?”
शकुंतला
(आश्वस्ति से)
“हाँ, राजन्—वियोग-वेदना की परतें ढह चुकी हैं; आज तुझसे पुनर्मिलन को अनन्तकाल प्रतीक्षित हूँ।”
राजा दुष्यन्त शर्मिंदगी से सिर झुकाते हैं तथा पद-पीछे चलकर उनके समानांतर खड़े हो जाते हैं।
राजा दुष्यन्त
“नहीं, हे सुंदरी! वह मेरे उत्तरदायित्व का द्योतक-अभिज्ञान-पट्ट तेरे प्रति सम्मान की रूपरेखा है। आज मैं स्वयं तुम्हें यह पुनः समर्पित करता हूँ।”
रथ-सी गरिमा में राजा दुष्यन्त शिरोरेखा से अपना चिन्हित अंगूठी दाँव पर रखते हुए उन्हें सौंपते हैं।
श्रुतमित्र
(मुस्कान से)
“महाराज, इस मिलन ने वसुंधरा पर दिव्य धूप बिखेरी।”
कुमारिका
(स्नेहपूर्वक शकुंतला का हाथ थामकर)
“अब यह वन-दर्शन तुम्हारे हृदय-मधु को स्थायी सुख देगा।”
शकुंतला प्रसन्न-भाव से विभोर हो मृदंग-तान पर नृत्य-सदृश् गमन करती है; दुष्यन्त मुस्कान के साथ उनका अनुसरण करते हैं।
अंक VII. पुनर्मिलन और राज्यारोहण
दृश्य: राजमहल का प्रांगण, प्रातःकाल
पात्र: राजा दुष्यन्त, शकुंतला, श्रुतमित्र, कुमारिका, पुरोहित, दरबारी
कुछ क्षण पहले के वन-दर्शन की मधुर स्मृति के साथ राजा दुष्यन्त प्रांगण में प्रवेश करते हैं। चारों ओर स्वागत-कमल बिछे हैं, ध्वज लहरा रहे हैं। दरबारी मंच पर खड़े होकर वंदना करते हैं।
राजा दुष्यन्त सिंहासन की ओर बढ़ते हुए मंद मुस्कान के साथ कहते हैं, “आज का दिन न केवल मेरे प्राणों का, वरन् राज्य की नई आराधनाओं का भी आरम्भ करेगा।”
उनकी वाणी सुनकर दरबारी थोर-सी उत्सुक मुद्रा में पंक्तिवद्ध होते हैं। किंतु तभी द्वार खोलकर शकुंतला प्रकट होती है, हाथ में पुष्पव्योरा और कुमारिका साथ लेकर वरतिनी-सनिर्भय।
शकुंतला अपनी धीमी चाल से सिंहासन-प्रक्षालित पटल के समीप आती है, जहाँ राजा विराजमान हैं।
राजा दुष्यन्त, उठकर, उनके पास आते हुए, दिव्य सौजन्य में कहता है, “हे शकुंतला, तुम्हारी पुनः उपस्थिति ने न केवल मेरे हृदय, अपितु समस्त प्रजा के हृदयों में आनंद की लहर फैला दी। आओ, मेरे साथ राज्य की गद्दी पर विराजो।”
शकुंतला, वंदनावश, सिंहासन पर आ पहुंचकर उनकी आगे झुककर अभिवादन करती है। कुमारिका और श्रुतमित्र दोनों आकर उनका हाथ थाम लेते हैं, और पुरोहित आगे बढ़कर मंत्र-संहिता पढ़ते हुए राज्यारोहण की पूजन-क्रिया सम्पन्न करते हैं।
पुरोहित उच्च स्वर से उद्घोष करता है, “इति श्रीदुष्यन्त-सम्प्राप्त कलश-पूजा क्रियया शकुंतला-स्त्री राजगद्दि-हस्तान्तरणं संपतम्; राज्याभिषेकः सिद्धः।”
सभी दरबारी एक साथ भगवान् वन्दना करते हैं, “जय श्रीराज-द्वय! जय श्रीदुष्यन्त-शकुंतला!”
राजा दुष्यन्त उठकर, राज्याभिषेकम् उपलक्ष्य, अलंकृत परिधान में शत-शत स्वागतकार्यों का निरीक्षण करते हैं; शकुंतला ग्लानि बिनाहि, शान्तचित्त मुग्धा-हास्य के साथ उनके समीप खड़ी रहती है।
दूत को इशारा करके राजा आदेश देते हैं, “अभी शीघ्र ही नगर के कोने-कोने में इस आनंद-वार्ता का संदेश प्रेषित किया जाए, तथा कल राजसभा में विशाल उत्सव आयोजित हो।”
दूत सिर झुकाकर स्मरण-चिह्नित अभिज्ञान-पट्ट की पुनः प्रतिष्ठा की बात करता है।
राजा दुष्यन्त निर्मल हृदय से वन्दन करते हुए कहते हैं, “यह चिह्न अब राज्य का अमूल्य मन्त्र है—स्मृति, प्रेम और न्याय का प्रतीक।”
[परदा धीरे-धीरे गिरता है; मंच पर सभी पात्र एक साथ उठकर दीर्घनोट श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं और आनंदपूर्वक प्रस्थान करते हैं।]
उपसंहार (Epilogue)
भरतवाणी आश्रम की छाया से लेकर राजमहल की दीप्ति तक, प्रेम और न्याय की यह यात्रा पूर्ण हुई। दुष्यन्त और शकुंतला का मिलन केवल दो हृदयों का संगम नहीं, अपितु स्मृति, समरस्ता और सत्य की विजय का प्रतीक बन गया।
हमने देखा कि कैसे एक अभिज्ञान-पट्ट ने दुर्भाग्य की छाया को छटाकर पुनः सौभाग्य का मार्ग प्रशस्त किया। कैसे मित्रता और दया ने तिरस्कार और श्राप के बाद भी अटल आस्था की ज्योति उड़ेल दी। और अंततः, राजसी सिंहासन पर बैठकर भी, शकुंतला ने अपने आदर्शों और प्रेम के प्रति निष्ठा नहीं खोई।
यह नाटक हमें यह सिखाता है कि—सच्ची यादगार वही है जो दिलों में अंकित हो; सच्ची शक्ति वही है जो क्षणिक शक्ति-बाधाओं से परे अटल रहे; और सच्चा अधिकार वही है जो न्याय और प्रेम से प्रतिष्ठित हो।
दर्शकों, आप भी अपने जीवन-मंच पर इन आदर्शों को आत्मसात करें—
न्याय का पालन करें, मित्रता निभाएँ, और प्रेम के बंधन को स्मृति-पट के रूप में सदैव धारण करें।
समाप्त
