परिचय
I. लेखक और नाटक
शूद्रक नामक राजा द्वारा रचित और संस्कृत एवं प्राकृत से आर्थर विलियम रायडर द्वारा अंग्रेज़ी निबंध और छंद में अनूदित यह नाटक “मृच्छकटिक” अर्थात् The Little Clay Cart हिंदू रंगमंच का एक अद्भुत उदाहरण है। किंतु शूद्रक के जीवन, काल या पहचान के सम्बन्ध में हमारे पास प्रत्यक्ष प्रमाण अत्यंत कम हैं। उनके विषय में जो कथाएँ प्रचलित हैं, वे लेखक के रूप में उन्हें कभी प्रदर्शित नहीं करतीं। इस अकथनीय अज्ञान ही में हमारी भलाई है, क्योंकि हमें उनके व्यक्तित्व को जानने के लिए केवल नाटक को स्वयं से समझना होगा।
भारतीय नाट्य-साहित्य में कालिदास, भूपति तथा शूद्रक—ये तीनों महान् रूप हैं, पर इनमें शूद्रक विशेष इस दृष्टि से हैं कि उनके पात्र और विषय-चरित्र जगत के सार्वभौमिक भाव-चित्रण से ओत-प्रोत हैं। जहाँ कालिदास और भूपति की भाषा मौलिक सौंदर्य और महाकाव्यात्मक गम्भीरता के लिए विख्यात है, वहीं शूद्रक का भाव-प्रकाशन सरल, सीधा और प्रवहमान है। उनकी भाषा में भारी-मोँछी अलंकारिकता नहीं, बल्कि प्रेमपूर्ण हास्य, तीव्र गति और विविधता का संगम मिलता है।
इस नाटक के नामक अंकों — “जो खेल से होटेल में छूट गए गहने” से लेकर “हाथी की नाल के समान पीले और गरजते मेघ” — में जहाँ मनोरंजक हास्य है, वहीं “वसंतसेना की गला घोंटने” जैसी त्रासद गम्भीरता भी। इस नाटक में प्रेम-उत्सव, कुशल कारस्थियाँ, न्याय-प्रक्रिया में ग़लतियाँ, कुकर्मियों की चालाकी और नियति की करवटें—सब कुछ अंतःस्रष्टि से भरपूर है।
पात्रावलि
- चारुदत्त — एक ब्राह्मण व्यापारी
- रोहसेना — उनके पुत्र
- मैत्रेय — उनका मित्र
- वर्धमानक — चारुदत्त के गृहस्थाल में सेवक
- संस्ठानक — राजा पालक का जेठ
- स्थावरक — संस्ठानक का सेवक
- अन्य एक सेवक — संस्ठानक का
- एक दरबारी
- आर्यक — एक ग्वाला, जो बाद में राजा बनता है
- शर्विलक — एक ब्राह्मण, जो मदानिका से प्रेम करता है
- एक शैम्पूअर — जो बाद में बौद्ध भिक्षु बन जाता है
- मथुरा — जुआरी मास्टर
- दर्दुरक — जुआरी
- अन्य एक जुआरी
- कर्णपूरक, कुम्भीलक — वसंतसेना के सेवक
- वीरक, चन्दनक — पुलिसवाले
- गोहन, अहिंता — फाँसी कराने वाले
- वसंतसेना के घर के ढोंगी पेज
- एक न्यायाधीश, एक गिल्ड-वार्डन, एक क्लर्क, एक बीडल
- वसंतसेना — एक कोरटीज़न
- उसकी माता
- मदानिका — वसंतसेना की पैला सेविका
- अन्य एक सेविका — वसंतसेना की
- चारुदत्त की पत्नी
- रदानिका — चारुद्त्त के गृहस्थाल की एक सेविका
दृश्य: उज्जयिनी (अवन्ती के नाम से भी प्रसिद्ध) और उसके आसपास का क्षेत्र
प्रस्तावना (Prologue)
शिवाभिनंदन
हे दर्शकगण!
सर्पकुण्डल-सदृश् कमरबन्ध अपनी जंघा पर कसकर बने रखें,
इन्द्रिय रुद्ध कर श्वास थामें, मुनिवद् तन–मन रहें सम्मुचित;
आत्मचक्षु से परोक्ष परमात्मा को देखें, निर्विकार, सर्वगत अचेतन में लीन।
पुनः:
शिव का निकट–गलं आपके अंगरक्षण में रहे,
मानो गर्जमान मेघ पर अंकित श्रीगौरी का स्वर्णकुमंडल,
वह उज्जवल सौभाग्य–दीदिप्यमान तमस्र्समूह को भी शरण दे।
मंचनायक (Stage-director)
यह दीर्घ पूर्वारंभ दर्शकों का ध्यान क्षीण कर देता है!
अतः मैं आदरपूर्वक सम्मानीय महोदयगण का अभिवादन करता हूँ और इस नाटक “मृच्छकटिका” के मंचन की सूचना देता हूँ।
इसके रचयिता ऐसे थे –
जिनकी गरिमा हाथी-सी संदर्भित थी,
ककोरा पक्षी-सी निर्मल उनकी दृष्टि,
शशचाप-सी उज्जवल उनका व्यक्तित्व।
शूद्रक नामधारी,
विद्वानों में प्रथम,
सदाश्रम-धनी,
युद्ध-कौशल के धनी,
शतवर्ष-उम्र को अतिक्रमित कर निर्वाण को गत,
आत्मा-मेधा में प्रवीण,
वे थे सर्वज्ञ – श्री शूद्रक, धर्मिष्ठ नाटककार।
अंक I. रत्न पीछे रह गए
समय: शरद ऋतु
दृश्य: उज्जयिनी का एक सार्वजनिक स्थल
[प्रवेश: हाथ में एक ओढ़नी लिए मैत्रेय धीरे-धीरे आता है।]
चारुदत्त (उन्हें भेजते हुए):
अरे, मित्र, मैंने गृहस्थ-विद्धानों के देवताओं को अपने घर में यज्ञ-दान कर आशीर्वाद प्रार्थना की है; अब तुम भी उस चौड़ाहे पर स्थित देवियों को बलिदान अर्पित करो जहाँ चार मार्ग मिलते हैं।
मैत्रेय (इंकार करते हुए):
नहीं!
चारुदत्त:
क्यों नहीं?
मैत्रेय:
क्योंकि—even जब देवताओं को हमें सम्मानित करते हैं—वे मुझ पर अनुकम्पा नहीं करते। अतः पूजा-यज्ञ करने का फिर क्या लाभ?
चारुदत्त:
ऐसा नहीं, सखा! गृहस्थ का यह निरंतर कर्तव्य है।
वे देवता सर्वदा आनन्दित रहते हैं
दान-व्रत, ध्यान और प्रार्थनाओं में,
जो भौतिक मोह-बंधन दूर करके रहते हैं।
मैत्रेय (हाथ फैलाकर):
नहीं, मैं नहीं जाऊँगा। तुम किसी और को भेज देना—क्योंकि इस समय रथ-मार्ग पर नर्तकी, दरबारी, सेवक और पद्मभोगी घूम रहे हैं; वे मुझे हिकारत से पकड़ लेंगे, जैसे अँधेरे में उछलकर साँप में फंसता हुआ चूहा। पर तुम यहाँ क्या कर रहे हो?
चारुदत्त:
ठीक है, रहो यहीं; मैं अपनी पूजा स्वयं पूरा कर लूँगा।
(यहाँ से दृश्य आगे बढ़ता है: पीछे से “वसंतसेना! रुको!” आवाज़ आती है। अगली पंक्तियों में हम पावन-पथ पर पीछा होती वसंतसेना, सनस्थानक का घोर उल्लंघन, और चारुदत्त की उदारता का प्रसंग देखेंगे।)
दृश्य: चौबारे पर रथ मार्ग से उतरे हुए वसंतसेना का पीछा
[पृष्ठभूमि में दूर से आवाज़ें सुनाई देती हैं—“वसंतसेना! रुको!”]
वसंतसेना
(हड़बड़ी से घुमकर)
कौन पुकार रहा है? मेरे पीछे क्यों दौड़े आ रहे हो?
स्थावरक (संस्ठानक का सेवक, पीछे से दौड़कर):
रुको, वसंतसेना! राज्य-शासन ने तुम्हें गिरफ्तार करने का आदेश दिया है!
वसंतसेना
(क्रोधित होकर)
क्यों? मैंने तो कुछ भी अपराध नहीं किया!
संस्ठानक (कर्णपूरक को इशारा करता हुआ):
डपट दो इसे!
कर्णपूरक (आक्रमण करते हुए):
तुम्हें कोरटीन-चर्या के नियम तोड़ने का दोषी करार दिया गया है!
वसंतसेना
(पीछे हटकर, भयभीत)
कोरटीन-चर्या? ये कैसी बात है?
स्थावरक (हाथ पकड़कर खींचते हुए):
कानूनी निर्देशों का उल्लंघन—तुम्हें ताम-झाम वाली गाड़ी की अनुमति नहीं थी!
वसंतसेना
(आंसू भरकर)
मैं तो केवल अपना दैनिक भ्रमण कर रही थी—यह मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है!
स्थावरक (ईर्ष्यापूर्ण मुस्कान के साथ):
कोई जन्मसिद्ध अधिकार नहीं, कोरटीज़न! रानी-महारानी के निर्देश सर्वोपरि!
[वहाँ पहुँचता है चारुदत्त, अपना ओढ़नी संभालकर]
चारुदत्त
(गंभीर स्वर में)
क्या हो रहा है यहाँ? यह महिला कौन है, और क्यों उसे घसीट रहे हो?
स्थावरक
(तंग आँखों से)
यह अदालत का आदेश है—राज्यपाल का नाम बताया नहीं जा सकता, पर यह कोरटीज़न कानून तोड़ रही है।
चारुदत्त
(वसंतसेना की ओर बढ़ते हुए)
क्या? यह नारी तुमसे क्या चाह रही थी? बता दो।
वसंतसेना
(नम्रता पूर्वक, लेकिन दृढ़ स्वर में)
महात्मन्, मैं वसंतसेना हूँ, एक सम्मानित वेश्या, और मेरा दैनिक भ्रमण यूँ ही बन पक्का है। मुझे किसी को अपराधी बताना अनुचित है।
चारुदत्त
(स्थावरक को पीछे हटने का आदेश)
हट जाओ! यह महिला अपराधी नहीं, मेरे आश्रित समान है।
स्थावरक (घबरा कर पीछे हटता है)
चारुदत्त
(वसंतसेना का हाथ पकड़कर)
डरो मत—मैं तुम्हें सुरक्षित घर तक पहुँचाऊँगा।

वसंतसेना
(लज्जित, पर कृतज्ञ)
क्या आप मुझे घर छोड़ने की कृपा करेंगे, महा-भद्र?
चारुदत्त
स्वाभाविकतः! आओ मेरे साथ—न्याय की इस यातना से पहले तुम्हें आराम मिलना चाहिए।
[चारुदत्त वसंतसेना को घेरे में लेकर धीमे कदमों से मार्गमाथे बढ़ता है; दूसरा सेवक चुपके से आता है, चारुदत्त को सूचना देने के लिए।]
दृश्य बदलता है: चारुदत्त का गृहस्थाल
[चारुदत्त वसंतसेना को अपने गृहस्थाल के प्रांगण में लाता है; वहाँ वर्धमानक खड़ा रहता है।]
चारुदत्त
(वर्धमानक से)
वर्धमानक! शीघ्र ही यहाँ तक कोई अधिकारी आएगा; हमें उसे सहजता से काम निकालने देना है। अतः एक शांत कक्ष तैयार करो, जहाँ इस स्त्री को कोई सवाल-तलाश न हो।
वर्धमानक
(आज्ञा स्वीकारते हुए)
नौकरी स्वीकार है, भगवन्।
वसंतसेना
(चारुदत्त की ओर, धीमें स्वर में)
आपकी यह उदारता अकल्पनीय है। मैं आपके एहसान को कैसे चुका सकूँ?
चारुदत्त
(सहृदयता से मुस्कुराते हुए)
मेरा आतिथ्य ही मेरा कर्तव्य है; मेरा ध्यान तुम्हारी सुरक्षा पर ही रहेगा।
[परदा गिरता है]
अंक II. राज्यपाल का क्रोध
दृश्य: उज्जयिनी के महान्नगर-शाला (राज्यपाल का दरबार)
[परदा उठता है: राज्यपाल सिंहासन पर विराजमान, संस्ठानक उनके सम्मुख खड़ा]
राज्यपाल
(कठोर उकसाहट से)
संस्ठानक! चारुदत्त ने तुम्हारे आदेश को ठुकरा दिया—और, जो घोर अनर्थ है, उसने वसंतसेना को अपने घर में आश्रय प्रदान किया!
संस्ठानक
(शत्रुता से)
महाराज, चारुदत्त नामक वह ब्राह्मण दरिद्र तो नहीं, पर धर्म का दास है—और उसका दासत्व वेश्या के प्रति है!
राज्यपाल
(आँखें तरेरते हुए)
वेश्या? कौन सी वेश्या?
संस्ठानक
(चीखकर)
वसंतसेना! वह सम्मानित—and कोरटीज़न! जिसे राज्य ने अपना सामाजिक कर्तव्य मानकर पक्षपात पूर्ण व्यवहार से वर्जित किया हुआ था!
राज्यपाल
(भारी स्वर में)
क्या? यह अपराध नहीं, राज्यद्रोह है! चौबारे पर सार्वजनिक स्थान से वसंतसेना का अपहरण करके अपने घर पाने जैसा दुष्कृत्य!
संस्ठानक
(हाय ताने मारते हुए)
और उसने—
- राजा के विधि-विरुद्ध आदेशों की अवहेलना की,
- न्याय-प्रक्रिया का उल्लंघन किया,
- तथा सार्वजनिक पथ को असंलग्न कर दिया!
राज्यपाल
(उग्रता से)
इस ब्राह्मण को तुरंत गिरफ्तार करो! उसकी संपत्ति जप्त करो, और उसे कारागृह के सबसे अंधकारमय कक्ष में बंद करो!
दरबारी
(सर झुकाकर)
तुरंत आदेश लागू किया जाएगा, महाराज।
पुरोहित (चुपके से राज्यपाल को):
(विनम्र स्वर में)
महाराज, क्या आपने चारुदत्त के शील-चरित्र की परीक्षा की? वह पूर्व में समाज को दान-धर्म से लाभान्वित करता आया है।
राज्यपाल
(ताने मारते हुए)
पर आज उसने राज्य का अपमान किया। धर्म-ध्वज झुकाए बिना न्याय कैसे हो सकता है?
पुरोहित
(शांति से)
न्याय तभी न्याय कहलाई, जब वह करुणा और विवेक से संचालित हो।
राज्यपाल
(तन कर)
यह राज्य का विधान है—मुझसे उसका उल्लंघन सहन नहीं होगा। संस्ठानक, तुम ही निश्चय करो, कौन उसे पकड़कर लाएगा?
संस्ठानक
(घोर उत्साह से)
मंत्रिपरिषद् और पुलिस दोनों ही तत्पर हैं, महाराज!
राज्यपाल
(घबराहट में मुस्कुराकर)
ठीक है। पर याद रखना—कोई भी इस कृत्य में अधिकारी की आलोचना नहीं करेगा।
पुरोहित
(मन ही मन)
(उसकी कठोरता उदार हृदयों को दंडित कर रही है…)
[परदा गिरता है]
अंक III. सत्य का उद्घाटन
दृश्य: चारुदत्त का गृहस्थाल का प्रागण
[दरवाज़े पर वीरक और चन्दनक—दो प्रहरी—तल्लीन मुद्रा में खड़े हैं। वर्धमानक उन्हें दूर से देखता है और चारुदत्त को सूचित करने के लिए आता है।]
वर्धमानक
(फुसफुसाकर)
भगवन्, प्रहरी आए हुए हैं—वे पूछताछ करना चाहते हैं।”
चारुदत्त
(चिंतित)
पूछताछ? क्यों?
वर्धमानक
राज्यपाल के आदेश से—they demand to see the woman whom you sheltered।
चारुदत्त
(दृढ़ भाव से)
ठीक है—पुलिस को भीतर आने दो। मैं स्वयं उनसे सामना करूँगा।
[वीरक और चन्दनक प्रवेश करते हैं; चारुदत्त का अभिवादन स्वीकार करते हुए वे सामने आते हैं।]
वीरक
(सख्त स्वर में)
श्री चारुदत्त, आप पर राज्यपाल का आरोप है कि आपने कोरटीज़न वसंतसेना को अपने घर में छिपाया है। हमें उसे प्रत्यक्ष दिखाएँ, अन्यथा आपको दोषी ठहराया जाएगा।
चारुदत्त
(शांत चित्त से)
यदि वह यहीं है, तो मैं उसे स्वयं बुला लाता हूँ। कृपया प्रतीक्षा करें।
[चारुदत्त भीतर की ओर जाता है; थोड़ी देर बाद वसंतसेना सामने आती है, सर झुकाए हुए।]
वसंतसेना
(कम स्वर में)
महाप्रहरी, आपने बुलाया था?
चन्दनक
(झट से)
हाँ! राज्यपाल का आदेश अवहेलना करके आपने यहाँ आश्रय लिया।
वीरक
(समीक्षा करते हुए)
तुम वसंतसेना हो?
वसंतसेना
(साहसपूर्वक)
हाँ, महाशय।
वीरक
(कानूनी पकड़ से)
तुम्हें गिरफ्तार किया जाता है—राज्य ने तुम्हें सार्वजनिक भ्रमण का अधिकार नहीं दिया था।
वसंतसेना
(भीख माँगती सी आवाज़ में)
कृपया—चारुदत्त ने मुझे संरक्षण दिया।
चन्दनक
(चारुदत्त की ओर मुड़कर)
और तुमने उसे संरक्षण दिया—क्या तुम्हें पदक का मोह है?
चारुदत्त
(उदासीन होकर)
नहीं, मैं केवल न्याय चाहता हूँ। यह स्त्री निर्दोष है।
वीरक
(कठिन भाव से)
निर्दोष? उसने तो कोरटीज़न-विज्ञान का उल्लंघन किया।
वसंतसेना
(नम्रता से)
मैंने सार्वजनिक मार्ग पर अपराध नहीं किया; मात्र तय किया था कि मैं रोज़ अपनी यात्रा करूँगी, जैसा कि मुझ पर अधिकार है।
चन्दनक
(मतभेद व्यक्त करते हुए)
यह अधिकार केवल विशिष्ट स्त्रियों को प्राप्त था, न कि तुम्हें!
चारुदत्त
(धीमे स्वर में)
न्याय कहाँ है—यदि नियम केवल कुछ के लिए हो?
वीरक
(आदेश देते हुए)
ठीक है—तुम दोनों! चारुदत्त और वसंतसेना—दंडित कक्ष में खड़े हो जाओ।
[वीरक और चन्दनक उन्हें पकड़कर बाहर ले जाने की तैयारी करते हैं; तभी शैम्पूअर प्रवेश करता है, बढ़ी हुई सहजता के साथ।]
शैम्पूअर
(मधुर स्वर में)
रुको! ये क्या दृश्य है? चारुदत्त और वसंतसेना को बन्दी बना रहे हो?
वीरक
(चौंकते हुए)
कौन बोलता है?
शैम्पूअर
(भव्यता से)
मैं शैम्पूअर हूँ, जिसने वसंतसेना को सुशोभित किया है—यह देखना चाहता हूँ कि उसे कौन बंदी बना रहा है?
चन्दनक
(हिचकिचाते हुए)
तुम्हारा अधिकारी दर्जा क्या है?
शैम्पूअर
(मुस्कुराकर)
मैं अब भिक्षु हूँ, पर पूर्व में शैम्पूअर था—राज्य ने मुझे पावनता का अधिकार दिया।
वीरक
(बाध्यता से)
ठीक है—पर इस स्त्री को भी पकड़कर ले जाना होगा।
[शैम्पूअर कदम बढ़ाता है, वीरो की बंदी करने की कोशिश में हस्तक्षेप करने के लिए।]
शैम्पूअर
(गंभीर होकर)
नहीं! इस स्त्री को केवल चारुदत्त ने नहीं, बल्कि मैंने भी सुरक्षा दी थी—और हम दोनों का दायित्व है कि उसे निष्पक्ष न्याय दिलाएँ।
वीरक
(संदेह से)
तुम्हें क्या अधिकार है?
शैम्पूअर
(निर्णयपूर्वक)
मैं राज्य का स्वतंत्र कल्याण-सूचक हूँ; मेरी दृष्टि में अपराध स्पष्ट है—न्याय का पालन होना चाहिए, न कि भेदभाव।
वीरक
(विचलित)
यदि भिक्षु ऐसा कह रहे हैं, तो… पर हमें श्रेष्ठतम अधिकार स्थापित करना होगा।
चन्दनक
(अंततः झुककर)
न्याय की परीक्षा ले ली जाएगी; फिलहाल, चारुदत्त और वसंतसेना को छोड़ दो।
[वीरक और चन्दनक पीछे हटते हैं; शैम्पूअर वसंतसेना के पास झुककर उसे आश्वस्त करता है; चारुदत्त शांति से मुस्कुराता है।]
अंक IV. प्रेम और दायित्व
दृश्य: चारुदत्त का गृहस्थाल, एक शांत कक्ष जहाँ वसंतसेना रहती है
[परदा उठता है: वसंतसेना बैठी है; चारुदत्त प्रवेश करते हैं, हाथ में एक पात्र प्रीतिकर पुष्पजल लेकर।]
चारुदत्त
(सहृदयता से)
यह लो, तुम्हारे लिए शुद्ध जल—ताकि थकान दूर हो और मन शान्त किया जा सके।
वसंतसेना
(नम्रता से जल ग्रहण करते हुए)
धन्यवाद, भगवन्। आपकी करुणा अपार है।
चारुदत्त
(विचलित स्वर में)
मेरा हृदय अस्वस्थ है—मैं राज्य के क्रोध और तुम्हारे दुःख के मध्य फँसा हूँ।
वसंतसेना
(संजीदگی से)
आपने जो कुछ भी किया, वह न्याय का दायित्व था। पर मैं आपकी भलाई नहीं चाहती—आप अपमानित होंगे।
चारुदत्त
(दृढ़ता से)
नहीं! यदि न्याय न हो, तो जीवन का क्या अर्थ? मैं तुम्हें तख़्ता-राज्य की मनमानी से नहीं सौंपूँगा।
वसंतसेना
(करुण भाव से)
मेरा भाग्य चाहे जो हो, मुझे आपकी मित्रता याद रहेगी।
चारुद्त्त
(धीरे से)
किंतु मेरा प्रेम—क्या मैं उसे 表現 करूँ?
वसंतसेना
(आश्चर्य से)
प्रेम?
चारुद्त्त
(अपने हृदय की बात कहकर)
हाँ—जब मैंने तुम्हें गर्तवत् संकट में देखा, तो मेरे भीतर कुछ जाग उठा। तुम्हारी रक्षा करना मेरे धर्म से बढ़कर मेरा कर्तव्य बन गया।
वसंतसेना
(हल्की शर्म से)
यह असाधारण है, महा-भद्र—क्योंकि मुझ पर अपार दुर्भाग्य के बावजूद, आपने मुझे अपनाया।
चारुद्त्त
(मुस्कान के साथ)
तुम्हारा अदम्य साहस और सज्जनता ने मुझे मोहा। पर अब हमें उपाय ढूँढना होगा—राज्य के तानाशाह से कैसे झगड़ा करें?
वसंतसेना
(प्रस्ताव रखते हुए)
राजनीति की तिकड़मों में मैं कुशल नहीं—पर शायद आपकी मित्र, किरणिका, हमें सहायता कर सके।
चारुद्त्त
(चिंतन कर)
हाँ—मैत्रेय और किरणिका दोनों ही दर्शनीय बुद्धि के धनी हैं। मैं उन्हें आमंत्रित करूँगा।
[वर्धमानक कक्ष के बाहर दस्तक देता है; चारुद्त्त उसे प्रवेश का संकेत करता है।]
वर्धमानक
(प्रवेश करते हुए)
भगवन्, मैत्रेय यहाँ हैं, और साथ में किरणिका भी।
[मैत्रेय और किरणिका प्रवेश करते हैं; वसंतसेना विनम्रता से उनका अभिवादन करती है।]
मैत्रेय
(हँसते हुए)
चारुद्त्त! तुमने अपनी गृहस्थ साधना छोड़कर अंतरराष्ट्रीय न्याय-संघर्ष में प्रवेश ले लिया?
चारुद्त्त
(गंभीरता से)
मैत्रेय, राज्य ने मेरा सिर कलंकित कर देने का प्रण लिया। मैं वसंतसेना को उसके हक़ से वंचित नहीं होने दूँगा।
किरणिका
(कुछ सोचते हुए)
राजा का मन परिवर्तित करना कठिन है, पर असंभव नहीं। हमें ऐसा प्रस्ताव रखना होगा जो उसकी आत्मा को स्पर्श करे।
वसंतसेना
(अभिलषित स्वर में)
क्या मैं—क्या मैं कुछ कह सकती हूँ?
किरणिका
(उत्साहित होकर)
हां, तुम्हारा शब्द सबसे अधिक प्रभावी होगा—राजा को महसूस होता है कि तुम केवल एक वस्तु नहीं, बल्कि उसकी प्रजा की सद्गुणों की प्रतीक हो।
वसंतसेना
(संकुचित हृदय से)
महाराज, मैं उस स्त्री से अधिक कुछ नहीं, जिसने कभी किसी का उपकार नहीं भूला। मेरा अपराध मेरा आवागमन नहीं, बल्कि न्याय के प्रति आपकी उदासीनता है।
मैत्रेय
(प्रेमपूर्वक थपथपाते हुए)
वाह! सच्चाई की यह साधारण अभिव्यक्ति ही सबसे बड़ी शक्ति है।
चारुद्त्त
(उत्सुक)
अब हमें शीघ्र ही राजा का दरबार आयोजन करना होगा—जहाँ तुम अपनी बात रखोगी।
किरणिका
(तार्किक ढंग से)
हमारे पास केवल समय है—अगले प्रातः तक योजना तैयार रखें।
वसंतसेना
(नम्र हृदय से)
आप सबकी कृपा के बिना—मैं यह सब नहीं कर सकती।
[परदा गिरता है]
अंक V. न्याय-नवनीत
दृश्य: उज्जयिनी का राजदरबार, प्रातः काल
[परदा उठता है: सिंहासन पर राज्यपाल विराजमान; चारुदत्त, मैत्रेय, किरणिका और वसंतसेना दरबार-कक्ष में स्थित हैं। दरबारी चुप बैठकर प्रतीक्षा करते हैं।]
राज्यपाल
(गंभीर स्वर में)
चारुदत्त, तुमने आज स्वयं बुलाया—मुझे यह जानने का आग्रह है कि क्या कारण है जो तुम्हें राज्य की आज्ञा के विरुद्ध वसंतसेना को संरक्षण देने पर विवश करता है?
चारुदत्त
(आदरपूर्वक झुककर)
महाराज, न्याय की पूर्णता के लिए मैं स्वयं प्रस्तुत हुआ हूँ। यह स्त्री न तो अपराधी है, न अपराधी होने की संभावना रखती है।
राज्यपाल
(चालाकी से)
यदि ऐसा ही है, तो वसंतसेना, तुम्हें स्वयं ही अपनी दलील रखनी होगी।
किरणिका
(उनके अगल-बगल से कान भराती हुई)
महाराज, सुनें—
वसंतसेना
(सभी की ओर देखते हुए, स्थिर वाणी में)
महाराज, मैंने राज्य की मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं किया; मेरा अधिकार था कि मैं अपनी दैनिक यात्रा करूँ। यदि आपने मुझ पर प्रतिबंध लगाया, तो क्यों? केवल इसलिये कि मेरा पेशा भिन्न था?

राज्यपाल
(सतर्क होकर)
तुम्हारा पेशा?
वसंतसेना
हृदय और मर्म का कोई पेशा नहीं होता। मैं अपने-आप को इस नगर वर्ग का सम्मानित सदस्य मानती हूँ—क्योंकि मैंने सदाचार-अभ्यास किया, दान-दक्षता दिखायी, और कभी भी किसी का अपमान नहीं किया।
मैत्रेय
(सहायक स्वर में)
महाराज, चारुदत्त ने सत्य की रक्षा की—भले ही वह भारी राजनीतिक परिणाम लाये।
किरणिका
न्याय तभी होता है, जब सभी को समान अवसर मिले। वसंतसेना ने कोई ऐसा कृत्य नहीं किया, जिसका दंड समाज ने निर्धारित न किया हो।
राज्यपाल
(मनन करते हुए)
यदि मैं इस आराध्य-पूर्ण नारी के हृदय में देख पाता—क्या वह राज्य के प्रति सम्मान और भक्ति नहीं रखती?
वसंतसेना
(मधुरता से)
महाराज, मेरा कर्तव्य है अपने संरक्षक का आदर करना—पर आपका शासन भी मेरी आस्था का विषय है। मैं जानना चाहती हूँ: क्या आपकी दया में स्थान है?
राज्यपाल
(धीरे से मुस्कुराकर)
हाँ—यदि कोई श्रेष्ठ कारण हो।
वसंतसेना
(नम्र भाव से)
आपका राज्य आपके सैंकड़ों विषयों का घर है; यदि आप अपने नियम में दया न रखें, तो वह नियम ही तानाशाही बन जाएगा।
राज्यपाल
(थोड़ी देर मौन रहते हुए)
तुम्हारी वाणी में शक्ति है। चारुदत्त! तुम्हें उस पर गर्व होना चाहिए।
चारुदत्त
(विनम्रता से)
महाराज, यह उसका सामर्थ्य है, न कि मेरा।
राज्यपाल
(आज्ञा देते हुए)
इस नारी के विरुद्ध सभी आरोप खारिज किए जाते हैं। वसंतसेना, तुम स्वतंत्र हो—पर मुझे आशा है कि तुम अपने व्यवहार से राज्य का मान बढ़ाओगी।
वसंतसेना
(हार्दिक धन्यवाद देते हुए)
मैं आपका आभारी हूँ, महाराज।
राज्यपाल
(चारुदत्त की ओर मुड़कर)
चतुर्दत्त, तुम्हारी मित्रता का यह फल तुम्हें प्राप्त हो।
मैत्रेय
(वन्दना करते हुए)
जय हो न्याय का!
किरणिका
(हँसकर)
जय हो मानवीय ह्रदय की!
[परदा गिरता है, और मुस्कान भरे नोट पर समापन होता है।]
अंक VI. वियोग और पुनर्मिलन
दृश्य: चारुदत्त का गृहस्थाल, संध्या समय
[परदा उठता है: चारुदत्त ध्यानमग्न है; वसंतसेना विहंग-माला चबोते हुए पास बैठी है।]
चारुदत्त
(चित्त बदलता हुआ)
कितना विचित्र है—राज्यदल ने न्याय दिया, पर मेरा हृदय शांति अनुभव नहीं कर पा रहा।
वसंतसेना
(सहानुभूतिवश)
आप चिंता न करें, महाभद्र; आपने जो किया, वह अधर्म के विरुद्ध धर्म था।
चारुदत्त
(निराशा में)
पर कहीं मुझे यह भी भय है कि राज्यपाल का अनुग्रह स्थायी न हो—उसकी दया स्वरों की तरह क्षणिक है।
वसंतसेना
(धैर्यपूर्वक)
भय निर्धनता की खान है—पर मित्रता का दीपक स्वच्छ हृदय में स्थायी जलता है।
चारुदत्त
(संकोच से)
क्या तुम्हारा विश्वास इतना अटल है?
वसंतसेना
(प्रतिज्ञा करते हुए)
यदि पृथ्वी पर सत्य का कोई आधार हो, तो वह विश्वास ही है।
[एक गुप्त शोर—कोठरी का द्वार खुलता है; मथुरा और दर्दुरक, दो जुआरी—आते हैं।]
मथुरा
(हँसते हुए)
चारुदत्त! हमने सुना—तुमने वसंतसेना को खुले स्नेह से अपनाया।
दर्दुरक
(कुटिल स्वर में)
और अब ठगेगा कौन? क्या सोने के सिक्कों के साथ न्याय भी खरीदा जा सकता है?
चारुद्त
(सख्ती से)
तुम्हारी बात शिष्ट हुए बिना—हमारे घर में अपमानित होगी!
मथुरा
(बोझिल मुद्रा से)
ये सिक्के नहीं, साज़िश हैं—वह राज्य के चित्त को भुनाने आयी है।
वसंतसेना
(आक्रमण कर)
तुम्हारी चालाकियाँ अमानवीय हैं! यदि तुम्हें धन चाहिए, तो जुआ अपने लोग खेलें—न्याय की दुकान क्यों खराब कर रहे हो?
दर्दुरक
(ठहाका लगाकर)
यह न्याय के नाम पर दहेज-समाज का खेल है!
चारुदत्त
(प्रमुख होकर)
इस परंतु बोलना बंद करो! तुम्हें न्याय की समझ न हो तो मुँह बंद रखो!
[मथुरा और दर्दुरक क्षुब्ध होकर लौटते हैं; वसंतसेना और चारुदत्त आँखें मिलाकर ढेर सारा विश्वास व्यक्त करते हैं।]
वसंतसेना
(धीरे स्वर में)
सफलता और असफलता दोनों ही मित्र और शत्रु हैं—पर आत्मा को सच्चा सुख मिलता है प्रेम और धैर्य से।
चारुदत्त
(धीमें स्पर्श से वसंतसेना का हाथ थामकर)
तुमने आज मुझे जीवन का अमूल्य पाठ सिखाया।
वसंतसेना
(मुस्कराते हुए)
आपने मुझे घर और सम्मान दिया। यही मेरा सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार है।
[दोनों एक दूसरे की ओर देखते हुए मुस्कुराते हैं; संध्या का उजाला धीरे-धीरे मिटता हुआ अम्बर में विलीन होता है।]
[परदा गिरता है]
अंक VII. चाल और प्रत्युत्तर
दृश्य: उज्जयिनी का एकांत बजार मार्ग, रात्रि
[परदा उठता है: वसंतसेना मार्ग पार करते हुए धीमे कदमों से चल रही है; अचानक दो अपरिचित व्यक्ति—एक चालाक पुरुष (चक्रधर) और एक रहस्यमयी महिला (शकुंतला)—उसके सामने प्रकट होते हैं।]
चक्रधर
(मुस्कान के साथ)
रात के अँधेरे में क्यों घूम रही हो, सुंदरी?
वसंतसेना
(सतर्क होकर)
क्यों प्रश्न करते हो?
चक्रधर
(लालित्य से)
मेरा नाम चक्रधर—मैं व्यापारी नहीं, पर किसी रहस्य का वाहक हूँ।
शकुंतला
(नग्न जंघाओं से सज्जित, मधुर स्वर में)
और मैं शकुंतला; हम दोनों को एक संदेश मिला है—राज्य में बड़े खेल की तैयारी है।
वसंतसेना
(चौंककर)
क्या? किस प्रकार?
चक्रधर
(धीरे स्वर में)
संस्ठानक ने राजा को यह भ्रम दिया है कि चारुद्त्त की मित्रता तुम्हें राज्य-विरोधी षड्यंत्रों में संलग्न करती है।
शकुंतला
(उन्मत्त भाव से)
इसलिए वह चाहती है—राज्य का ध्यान तुम्हारी ओर न रहे, पर तुम्हें खामोश कर दिया जाए!
वसंतसेना
(कृपण हृदय से)
तो मुझे फिर से फंसा देना चाहते हैं?
चक्रधर
(मानवता दिखाते हुए)
नहीं! हम तुम्हें सचेत करना आए हैं—ताकि तुम चारुद्त्त के गृहस्थाल से सावधान उगलो।
वसंतसेना
(विचलित)
क्यों?
शकुंतला
(गम्भीर स्वर में)
क्योंकि संस्ठानक ने कल रात्रि वहाँ हमला करने की योजना बनाई है—राजा का आदेश नहीं, पर उसकी अपनी षड्यंत्रपूर्ण आकांक्षा।
वसंतसेना
(भय से)
चारुद्त्त की रक्षा के लिए मुझे तुरंत जाना होगा!
चक्रधर
(हाथ बढ़ाकर)
इसी मार्ग से लौटो—द्वार खुले रहेंगे, पर तेज़ कदम उठाओ।
शकुंतला
हम कल, एक नई सुबह पर, तुम्हारे साथ मिलकर राजा को सच्चाई बतायेंगे।
वसंतसेना
(ठाने से)
ठीक है—मैं तैयार रहूँगी।
[परदा गिरता है जब वसंतसेना तेज़ी से मार्ग चले जाने लगती है।]
अंक VIII. सत्य का उद्घाटन दोहरा
दृश्य: चारुदत्त का गृहस्थाल, मध्यरात्रि का समय
[परदा उठता है: चारुद्त्त अपने कक्ष की खिड़की से बाहर झांकते हैं; वसंतसेना चुपचाप पास में कुवारी दीप जलाती है।]
चारुदत्त
(गंभीर स्वर में)
मुझ पर भारी निद्रा ठहर नहीं पा रही। क्या चक्रधर का शब्द सच था—क्या रात्रि में हमलों की साजिश रची जाएगी?
वसंतसेना
(दृढ़ता से)
हाँ, भगवन्। मैंने संस्ठानक के दो विशेष सेवकों को उनमें भाग लेते देखा है।
चारुदत्त
(उठकर तलवार हाथ में लेते हुए)
तो हमें पहले ही सुरक्षा व्यवस्था कड़ा करनी होगी। वर्धमानक को बुलाओ—परिसरों के द्वार नाकाबंदी करने को कहो।
[वर्धमानक शीघ्रता से प्रवेश करता है।]
वर्धमानक
(विनम्रता से)
भगवन्, क्या आज रात्रि को कोई विशेष आदेश है?
चारुदत्त
इन द्वारों पर पहरा बढ़ा दो; किसी को भी अनधिकृत रूप से प्रवेश न देना।
वर्धमानक
(आज्ञा स्वीकारी)
तुरंत हो जाएगा।
[वसंतसेना उठकर चारुद्त्त के पास आती है।]
वसंतसेना
(मृदु स्वर में)
आपकी सतर्कता सराहनीय है। फिर भी, यदि वे चुपके से अचानक हमला करें, तो?
चारुद्त्त
(विश्वासपूर्वक मुस्कुराते हुए)
तब हम अपनी कक्षों में बंद होंगे; और यदि कोई टूट-फूट करेगा, तो स्वयं सामना करेंगे।
[अचानक दूर से कोलाहल—घातक कदमों की हल्की आहट—समान्तर द्वार की ओर।]
वसंतसेना
(चौंककर)
सुनिए! कदमों की आहट—वे आ रहे हैं!
[तीन-चार साजिशकर्ता—दो सिपाही और दो सेवक—द्वार फोड़ने का प्रयत्न करते हुए आते हैं।]
घातक 1
(कुटिल हँसी के साथ)
चुपके से दस्तक दी—अब चुप नहीं रहेंगे!
वर्धमानक
(कांपता हुआ आवाज़ में)
भगवान्—हम तैयार नहीं!
चारुद्त्त
(धैर्यपूर्वक तलवार उठाते हुए)
बंद करो! चाहे जो हो, इस गृहस्थाल की रक्षा मेरे धर्म से बड़ा मेरा कर्म है!
[एक संघर्ष होता है; चक्रधर अचानक प्रकट हो जाता है, उन पर प्रहार से रोकता है।]
चक्रधर
(चुनौतीपूर्ण स्वर में)
रुको! यह वध-दृश्य न घनिष्ठ मित्र के घर में उपयुक्त है।
घातक 2
(घबरा कर)
चक्रधर? तुमने हमें धोखा दिया!
चक्रधर
(निडरता से)
मैं सत्य का रक्षक हूँ—नहूँगा मैं उस खून में जो मित्रता के विरुद्ध हो!
[साजिशकर्ता हाथ जोड़कर टिक जाते हैं; चारुद्द्त उन्हें बाँधकर वर्धमानक को सौंपता है।]
वसंतसेना
(सहानुभूति से)
आपने जान जोखिम में डालकर हमें बचाया।
चारुद्त्त
(सहृदयता से)
सच्चाई की जय हो—और मित्रता के बंधन अमर हों!
[परदा गिरता है]
अंक IX. रहस्योद्घाटन
दृश्य: उज्जयिनी का राजमहल का एकांत कक्ष
[परदा उठता है: वसंतसेना कौशलपूर्वक बाँधियों से बंधी हुई, सिंहासन के निकट लायी जाती है; चारुदत्त, मैत्रेय, किरणिका और शैम्पूअर उसकी रक्षा में खड़े हैं। राज्यपाल ही उस कक्ष में प्रवेश करता है।]
राज्यपाल
(दृढ़ स्वर में)
तो यह वह स्त्री है, जिसने चारुदत्त को राज्य-विरोधी षड्यंत्र में फँसाया?
वसंतसेना
(नम्रता से)
महाराज, सच्चाई तो आपने स्वयं देखी है—मैंने कोई षड्यंत्र नहीं रचा।
राज्यपाल
(कटु मुरझान के साथ)
फिर भी, तुम्हारी उपस्थिति यहाँ व्यसनी और हानिकारक लगती है।
शैम्पूअर
(राज्यपाल के समीप आकर)
महाराज, तर्पण करते हुए ज्ञात कर रहा हूँ—इस स्त्री में कोई धोखा नहीं, केवल एक स्वच्छ जीवन का आदर्श!
मैत्रेय
(अवहारिक उर्द्ध्वश्रुति में)
राजा हो! न्याय-मंडल ने बार-बार उसे दोषमुक्त ठहराया।
किरणिका
(हस्तक्षेप करते हुए)
महाराज, एक अंतिम परीक्षा शेष है—उसके अतीत का रहस्य!
राज्यपाल
(मननपूर्वक)
ठीक है, खोलो वह आरोपपत्र।
[विभिन्न दस्तावेज़ शैम्पूअर द्वारा परवाने जाते हैं; उसमें एक स्वर्ण पटल पर अंकित ‘राजकुमारी वसंतसेना’ का मुहर होता है।]
शैम्पूअर
(उत्साहित स्वर में)
महाराज, यह दस्तावेज़ प्रमाणित करता है कि वसंतसेना—वह वही राजकुमारी है—जिसे बचपन में असुरक्षित काल में अपहरण करके वेश्यावृत्ति के गर्त में धकेल दिया गया था।
वसंतसेना
(आश्चर्यों से चकित)
राजकुमारी? यह कैसे संभव है?
मैत्रेय
(साफ़ आवाज़ में)
तुम्हारे बचपन की स्मृतियाँ लौट आयीं—तुम एक दृष्टिहीन राजा की पुत्री थी, जिसे महल से बहकाकर ले जाया गया था।
राज्यपाल
(नम्र भाव से)
यदि यह सत्य है, तो तुम मेरा रक्तहीन दायित्व हो।
किरणिका
(गम्भीरता से)
इसलिये तुम्हारी रक्षा और सम्मान—दोनों ही चारुदत्त का ऋण है।
राज्यपाल
(सनातनता से)
चारुदत्त, तुम्हारा यह दायित्व न सिर्फ वैध, अपितु राजकुल-रक्षक होने का प्रतीक है।
चारुदत्त
(विनम्रता से)
महाराज, यही मेरा परम कर्तव्य था—न्याय और रक्षा के मार्ग पर चलना।
राज्यपाल
(आज्ञा देते हुए)
तो अब—
- राज्य की ओर से वसंतसेना को उसके आगत अधिकारों और पद की पुनर्स्थापना मिले।
- चारुदत्त को राज्य का प्रथम मंत्री-परामर्शदाता नियुक्त किया जाए।
- जो भी अपराधियों ने इस महिला के विरुद्ध षड्यंत्र रचे, उन्हें दण्डित किया जाए।
वसंतसेना
(आँसू भरे स्वर में)
धन्यवाद, महाराज—आपकी दया से मेरा जीवन सफल हुआ।
मंच पर सभी पात्र मिलकर राज्यपाल का अभिवादन करते हैं।]
अंत निशा (Epilogue)
शिवाभिनंदन
हे भक्तजन,
इस नाट्ययात्रा का समापन हुआ—वसंतसेना को पुन: उसके गौरव का हाथ मिला,
चारुदत्त को सम्मान-शीर्ष पर विराजित किया गया,
न्याय और मित्रता की विजय हुई।कलामयी नीति, करुणा की राह दिखायी,
हृदय ने स्वात्मनि शान्ति पायी।अब सत्व-संघर्ष से परे चलो, और जीवन-मंच पर सदैव धर्म-पथ पर अग्रसर रहो।
[समस्त पात्र मंच पर एकत्र होकर दर्शकों का अभिनंदन करते हैं, और परदा गिरता है।]