
गर्मी का एक दिन था, जब सूरज ने अपने पूरे रंग में आकाश को लाल और पीला बना दिया था। पूरा शहर जल रहा था, और लोग अपने कामों में व्यस्त थे, लेकिन उस दिन एक बगीचे में एक खास मेला लगने वाला था। यह मेला विशेष रूप से बड़ों के लिए आयोजित किया गया था, जो अपनी बचपन की यादों को ताजा करने के लिए आए थे।
शहर के बाहर के एक छोटे से गांव में रहने वाले राधेश्याम जी, अपनी पत्नी सरिता के साथ, इस मेले का हिस्सा बनने के लिए निकले। राधेश्याम जी की उम्र करीब साठ साल थी, लेकिन उनके चेहरे पर एक युवा उत्साह था। गर्मी के इस भयंकर दिन में भी उनका मन उमंग से भरा था। उन्होंने अपनी पत्नी से कहा, “सरिता, आज हमें मेला अवश्य जाना चाहिए। बचपन की यादें ताजा होंगी।”
सरिता ने मुस्कुराते हुए कहा, “बिल्कुल, लेकिन पहले थोड़ी छांव में बैठ लें।” वे दोनों पास के एक पेड़ के नीचे बैठ गए। गर्मी की धूप से बचने के लिए पेड़ की छाया एक राहत थी। सरिता ने यादों में खोकर कहा, “क्या तुम याद करते हो, जब हम छोटे थे, गर्मियों की छुट्टियों में अपनी दादी के पास जाते थे?”
राधेश्याम जी ने आँखें बंद करके कहा, “हाँ, दादी के बगीचे में वो आम के पेड़ और नींबू के बाग़। वहाँ की ठंडी छांव में बैठकर हम घंटों बातें करते थे।” इस याद ने उनके दिल में एक गहरी खुशबू भर दी।
बगीचे में पहुँचते ही दोनों ने देखा कि लोग हंसते-खिलखिलाते हुए विभिन्न खेलों और गतिविधियों में व्यस्त थे। जले हुए चेहरे, पसीने से लथपथ कपड़े, लेकिन हर किसी की आंखों में खुशी की चमक थी। राधेश्याम जी और सरिता ने मेले में विभिन्न स्टाल्स को देखा। वहाँ झूला, गुब्बारे और मिठाइयों के ठेले लगे थे।
“चलो, पहले झूला झूलते हैं,” सरिता ने कहा। राधेश्याम जी ने हंसते हुए कहा, “अरे, क्या हम सच में झूला झूलने वाले हैं?” लेकिन सरिता की मासूमियत ने उन्हें फिर से युवा बना दिया।
वे झूले पर बैठे, और जैसे ही झूला झूलने लगा, राधेश्याम जी ने महसूस किया कि वह फिर से अपने बचपन में लौट गए हैं। उनकी आँखों में आँसू आ गए, लेकिन यह खुशी के आँसू थे। सरिता ने उनकी आँखों में देखा और मुस्कुराते हुए कहा, “यहाँ तो हम फिर से बच्चे बन गए हैं।”
गर्मी की धूप और पसीने की परवाह किए बिना, उन्होंने मेले का पूरा आनंद लिया। मिठाइयाँ खाईं, खेल खेले और एक-दूसरे के साथ गप्पें मारते रहे।
लेकिन जैसे-जैसे दिन ढलने लगा, गर्मी ने फिर से अपनी काली छाया फैलानी शुरू कर दी। राधेश्याम जी ने कहा, “सरिता, चलो अब घर चलते हैं।” सरिता ने सहमति में सिर हिलाया।
जाते-जाते राधेश्याम जी ने पीछे मुड़कर बगीचे को देखा, जहाँ लोग अभी भी आनंदित थे। उन्होंने सोचा, “यह गर्मी का दिन भले ही कष्टदायक हो, लेकिन यादों की मिठास उसे भुला देती है।”
घर लौटते समय, उन्होंने एक-दूसरे का हाथ थाम लिया। सामान्य जीवन की भागदौड़ में खोए हुए लोग, उस दिन मेले में बिताए समय की मिठास को सीने में समेटे हुए थे। गर्मी सिर्फ एक मौसम नहीं थी, बल्कि एक अनुभव थी, जो उन्हें फिर से जोड़ने में सफल हुई थी।
